पूजा विधि

कलश स्थापना विधि: सामग्री, मंत्र और कदम-दर-कदम पूजा क्रम

प्रकाशन: 2 अक्टूबर 2026 अंतिम अपडेट: 2 अक्टूबर 2026 4 मिनट

कलश स्थापना विशेष पूजा और अनुष्ठान का प्रमुख चरण है। नवरात्रि, वार्षिक पूजा, गृहप्रवेश और यज्ञ-हवन जैसे अवसरों में कलश स्थापित करके उसमें जल, आम्रपत्र और नारियल रखा जाता है, ताकि देवता का आवाहन और जल-संबंधी उपचार विधिवत हो सके। यहां कलश की सामग्री, स्थापना मंत्र और कदम-दर-कदम क्रम विस्तार से है।

कलश स्थापना की रीति परिवार और क्षेत्र के अनुसार थोड़ी भिन्न होती है। घर की परंपरा या पंडित द्वारा बताई विधि को प्राथमिकता दें।

कलश क्या होता है और क्यों स्थापित करते हैं

कलश धातु, मिट्टी या चांदी का पात्र है, जिसमें जल, आम्रपत्र, दूर्वा और नारियल रखकर उसे देवता का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि कलश में सभी देवताओं का वास होता है, इसलिए पूजा की शुरुआत कलश स्थापना से की जाती है।

कलश स्थापना की सामग्री

  • कलश — मिट्टी, तांबा, पीतल या चांदी का।
  • जल और गंगाजल (उपलब्ध हो तो)।
  • आम के 5 या 7 पत्र (पंचपल्लव)।
  • नारियल और उस पर चढ़ाने वाला लाल कपड़ा या मौली।
  • अक्षत (चावल), रोली, दूर्वा, सुपारी।
  • जौ या चावल — कलश के नीचे बिछाने के लिए।
  • कुश या दूब, फूल, चंदन।
  • पूर्णपात्र — मिट्टी की कटोरी या लोटा।

सामान्य पूजा सामग्री के साथ इस सूची को मिलाकर देखें — पूजा सामग्री लिस्ट।

कलश स्थापना विधि कदम-दर-कदम

  1. स्थान तैयार करें — पूजा-स्थान की सफाई करके पूर्व या उत्तर दिशा की ओर चौक या अष्टदल बनाएं।
  2. धान्यपुंज रखें — चौक पर जौ या चावल का ढेर रखें।
  3. कलश स्थापित करें — जल से भरा कलश धान्यपुंज के ऊपर स्थापित करें। जल में गंगाजल मिलाएं।
  4. आम्रपत्र रखें — कलश के मुख में आम के 5 या 7 पत्र व्यवस्थित करें, पत्तियों का मुख भीतर की ओर रखें।
  5. नारियल स्थापित करें — आम्रपत्र के ऊपर लाल कपड़े में लिपटा नारियल रखें; कुछ परंपराओं में नारियल पर मौली और रोली लगाई जाती है।
  6. अक्षत और पुष्प — कलश पर अक्षत, पुष्प और रोली चढ़ाएं।
  7. देव-आवाहन — कलश को ही देवता का स्थान मानकर मंत्र से आवाहन करें।
  8. पूजा आरंभ — कलश की पंचोपचार विधि से पूजा करें, फिर शेष पूजा-क्रम आगे बढ़ाएं।

कलश स्थापना के मंत्र

  • जल-स्थापना मंत्र: “गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती। नर्मदे सिन्धु कावेरी जले अस्मिन् सन्निधिम् कुरु ॥”
  • वरुण आवाहन: “ॐ अपामपतये वरुणाय नमः”
  • सरल विकल्प: “ॐ जलं कुरु मे पाणिनि…” या घर की परंपरा के अनुसार कोई भी जल-संबंधित स्तोत्र पढ़ा जा सकता है।

अन्य पूजा मंत्रों और सरल प्रार्थनाओं के लिए पूजा विधि — सम्पूर्ण मार्गदर्शिका देखें।

कलश स्थापना के नियम और सावधानियां

  • कलश और जल पूरी तरह साफ हों; जल में मृत्पात्र या कीड़े न हों।
  • कई परंपराओं में रात्रि में कलश स्थापना से बचा जाता है और दिन के समय स्थापना को श्रेष्ठ माना जाता है; विशेष अनुष्ठान में आचार्य की सलाह लें।
  • कुछ विधियों में जल और नारियल अलग दिशा में रखने का भी प्रचलन है — अपनी परंपरा का पालन करें।
  • कलश पर चढ़ा जल समाप्त न हो; जरूरत पड़ने पर जल भरते रहें।
  • हवन के साथ कलश स्थापना कर रहे हैं तो हवन कैसे करें की सुरक्षा नियम भी पढ़ें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कलश में क्या-क्या रखना चाहिए?

साधारणतः जल, आम के पत्र, दूर्वा और ऊपर नारियल रखा जाता है। गंगाजल, सुपारी और रोली विशेष पूजा में जोड़ी जाती है।

कलश मिट्टी का हो या धातु का?

दोनों मान्य हैं। मिट्टी का कलश परंपरागत रूप से अधिक प्रचलित है, जबकि धातु का कलश बार-बार उपयोग में टिकाऊ होता है।

कलश स्थापना के बाद कलश कहां रखना चाहिए?

पूजा-स्थान की ओर मुख करके उत्तर या पूर्व दिशा में रखने का प्रचलन है। पूजा पूरी होने के बाद जल को सम्मानपूर्वक गमले या जलाशय में डालें।

कलश स्थापना कब तक रखते हैं?

अनुष्ठान के अनुसार — कुछ पर्वों में कुछ दिनों के लिए, तो कुछ में पूजा समाप्ति तक। विस्तृत विधि के लिए आचार्य से पूछें।

निष्कर्ष

कलश स्थापना साधारण लेकिन संकल्पपूर्ण क्रिया है — स्वच्छ कलश, व्यवस्थित आम्रपत्र, साफ जल और सही मंत्र। सामग्री और क्रम स्पष्ट हो तो यह विधि घर पर भी विधिवत पूरी की जा सकती है।

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