रत्न धारण विधि

रत्न कब बदलना चाहिए? मोती की आभा से नीलम की अवधि तक

प्रकाशन: 29 सितम्बर 2026 10 मिनट

सभी रत्नों को बदलने का समय एक जैसा नहीं है। ज्योतिषीय धारण-विधान में माणिक्य के लिए चार वर्ष, पन्ना के लिए तीन वर्ष और नीलम के लिए पाँच वर्ष की अवधि दी गई है। पुखराज और मूँगा के लिए वर्ष के साथ महीने या दिनों का भी निर्देश है। मोती का नियम अलग है—उसमें टूट-फूट और आभा की स्थिति प्रमुख है।

रत्न कब बदलना चाहिए, यह समझने के लिए अवधि के साथ उसकी शुरुआत भी देखनी होती है। कुछ निर्देश धारण करने के दिन से समय गिनते हैं, जबकि माणिक्य की अवधि अंगूठी में जड़ने के समय से दी गई है। दोनों तारीखें अलग हों तो बदलने की तारीख भी अलग निकलेगी।

यहाँ दी गई अवधियाँ ज्योतिषीय धारण से संबंधित हैं। इन्हें पत्थर की भौतिक उम्र या आभूषण के अपने-आप खराब हो जाने की समय-सीमा नहीं समझना चाहिए।

नवरत्न कितने समय तक धारण करें?

नीचे नौ रत्नों की अवधि एक साथ दी गई है। मोती के सामने निश्चित वर्षों की संख्या नहीं रखी गई है, क्योंकि उसका निर्देश आभा और टूट-फूट पर आधारित है।

रत्न

ग्रह

ज्योतिषीय प्रभाव की अवधि

गणना या विशेष निर्देश

माणिक्य

सूर्य

4 वर्ष

अंगूठी में जड़ने के समय से

मोती

चंद्रमा

निश्चित वर्ष नहीं दिए गए

जब तक टूटा-फूटा न हो और आभा बनी रहे

मूँगा

मंगल

3 वर्ष 3 दिन

पहनने के समय से

पन्ना

बुध

3 वर्ष

पहनने के दिन से

पुखराज

बृहस्पति

4 वर्ष 3 महीने 18 दिन

अंगूठी पहनने के दिन से

हीरा

शुक्र

7 वर्ष

अवधि पूरी होने पर बदलने का निर्देश

नीलम

शनि

5 वर्ष

धारण करने के दिन से

गोमेद

राहु

3 वर्ष

अवधि पूरी होने पर दूसरा गोमेद धारण करने का निर्देश

लहसुनिया

केतु

3 वर्ष

पहनने के दिन से

ग्रह और रत्न का संबंध विस्तार से समझने के लिए नवरत्नों के नाम और उनके ग्रह देखें। यहाँ मुख्य विषय उन्हीं रत्नों को धारण करने की अवधि और बदलने का समय है।

रत्न की अवधि किस तारीख से गिनें?

रत्न खरीदने, अंगूठी में जड़वाने और पहली बार पहनने की तारीखें अलग-अलग हो सकती हैं। इसलिए केवल खरीद का बिल देखकर हर रत्न की अवधि तय नहीं करनी चाहिए। जिस निर्देश में जिस घटना से गणना दी गई है, उसी को आधार बनाना आवश्यक है।

अंगूठी में जड़ने की तारीख

माणिक्य के लिए चार वर्ष की अवधि अंगूठी में जड़ने के समय से बताई गई है। यदि अंगूठी पहले तैयार हो गई और उसे कुछ समय बाद पहना गया, तो इस नियम में जड़ाई की तारीख महत्वपूर्ण होगी। खरीद की तारीख या पहनने की तारीख को उसके स्थान पर रखने से गणना बदल जाएगी।

पहली बार धारण करने की तारीख

मूँगा, पन्ना, पुखराज, नीलम और लहसुनिया के निर्देश में पहनने या धारण करने के दिन से अवधि दी गई है। इन रत्नों के लिए पहली बार धारण करने की तारीख लिखकर रखना उपयोगी है।

जिन विवरणों में शुरुआत की तारीख स्पष्ट नहीं दी गई है, वहाँ अपनी ओर से खरीद, जड़ाई या पहनने की तारीख को निश्चित नियम बनाकर नहीं जोड़ना चाहिए। हीरे और गोमेद की अवधि पढ़ते समय यह भेद ध्यान में रखें।

माणिक्य कब बदलना चाहिए?

माणिक्य की ज्योतिषीय प्रभाव-अवधि चार वर्ष दी गई है। इसकी गणना अंगूठी में जड़ने के समय से होती है। चार वर्ष पूरे होने के बाद दूसरा माणिक्य जड़वाने का निर्देश है।

यह नियम पढ़ते समय “चार वर्ष पहन लिया” और “चार वर्ष पहले जड़वाया था” का अंतर समझना आवश्यक है। दोनों बातें हमेशा एक नहीं होतीं। यदि जड़ाई और धारण एक ही दिन हुआ था, तो तारीख का अंतर नहीं आएगा; अन्यथा जड़ाई का विवरण देखना होगा।

रत्न बदलते समय केवल पुराना वजन दोहरा देना पूरा चयन नहीं है। नए नग का रंग, स्वच्छता और स्वरूप भी देखें। माणिक्य के रंग और पहचान का परिचय चयन के इन पहलुओं को अलग से समझाता है।

मोती कितने साल पहन सकते हैं?

मोती के लिए इस अवधि-विधान में तीन, पाँच या सात वर्ष जैसी निश्चित संख्या नहीं दी गई है। उसका नियम है कि मोती टूटा-फूटा न हो और उसकी आभा बनी रहे। इसलिए मोती का निर्णय केवल कैलेंडर देखकर नहीं होता।

दो मोती एक ही दिन पहने गए हों, फिर भी उनकी स्थिति बाद में अलग हो सकती है। किसी की आभा बनी रह सकती है और किसी में टूट-फूट दिखाई दे सकती है। इस नियम में मोती की वास्तविक दशा देखना अधिक महत्वपूर्ण है।

आभा का अर्थ केवल अंगूठी या धातु की चमक नहीं है। यहाँ स्वयं मोती की शोभा और उसकी स्थिति का विचार है। मोती के गुण-दोष और प्रकार समझने से उसके स्वरूप का निरीक्षण अधिक स्पष्ट होता है।

मूँगा कब बदलना चाहिए?

मूँगे की अवधि तीन वर्ष तीन दिन दी गई है। इसे पहनने के समय से गिना जाता है। इस अवधि के बाद नया मूँगा धारण करने का निर्देश है।

यहाँ तीन वर्ष के अतिरिक्त तीन दिन भी दिए गए हैं। इसलिए इसे केवल “तीन साल” लिख देने से पूरा निर्देश सामने नहीं आता। धारण की तारीख सुरक्षित हो तो पहले तीन वर्ष और फिर तीन दिन जोड़कर संबंधित तारीख निकाली जा सकती है।

मूँगे का चयन और उसकी अवधि दो अलग विषय हैं। अवधि पुराने रत्न को बदलने का समय बताती है, जबकि लाल मूँगे के गुण और स्वरूप नए नग को समझने में सहायता करते हैं।

पन्ना कितने साल पहनें?

पन्ना की ज्योतिषीय प्रभाव-अवधि तीन वर्ष है। यह समय पहनने के दिन से गिना जाता है। तीन वर्ष पूरे होने के बाद दूसरा पन्ना धारण करने का निर्देश है।

पन्ना पहले खरीदकर रख लिया गया हो और बाद में अंगूठी बनवाकर पहना गया हो, तो इस निर्देश में धारण का दिन आधार है। खरीद और धारण के बीच का अंतर अवधि की गणना में अपने-आप शामिल नहीं होता।

नया पन्ना चुनते समय उसके अपने गुणों का ध्यान रखें। पन्ना रत्न का विस्तृत परिचय रंग, पहचान और धारण से जुड़ी जानकारी को अलग समझने में उपयोगी है।

पुखराज कब बदलें?

पुखराज की अवधि चार वर्ष, तीन महीने और अठारह दिन दी गई है। इसकी गणना अंगूठी पहनने के दिन से होती है। नौ रत्नों की इस सूची में पुखराज का निर्देश विशेष रूप से विस्तृत है, क्योंकि इसमें वर्ष, महीने और दिन तीनों शामिल हैं।

इसे केवल चार वर्ष या साढ़े चार वर्ष लिखना सटीक नहीं होगा। तारीख निकालते समय धारण की मूल तारीख के आधार पर चार वर्ष, फिर तीन महीने और उसके बाद अठारह दिन का विचार करें।

पुखराज को बदलने का समय और उसका धारण-विधान अलग बातें हैं। अवधि पूरी होने पर नए नग के लिए धारण की तैयारी भी देखी जाती है। पुखराज का परिचय और धारण विधि उसी प्रक्रिया को विस्तार से समझाते हैं।

हीरा कितने वर्ष बाद बदलें?

हीरे की ज्योतिषीय प्रभाव-अवधि सात वर्ष दी गई है। इसके बाद बदलने का निर्देश है। इस सूची में निश्चित वर्षों में दी गई अवधियों की तुलना करें तो हीरे के लिए सबसे लंबा समय है।

यह अवधि ज्योतिषीय धारण से संबंधित है। सात वर्ष पूरे होने का अर्थ यह नहीं कि हीरा भौतिक रूप से समाप्त हो गया या आभूषण अपने-आप अनुपयोगी हो गया। रत्न का भौतिक स्वरूप और उसका ज्योतिषीय धारण-नियम अलग विषय हैं।

हीरे के चयन से जुड़ी जानकारी के लिए हीरा रत्न का परिचय देखें। पुराने रत्न की अवधि जानना नए नग की पहचान की आवश्यकता को समाप्त नहीं करता।

नीलम कितने साल पहनना चाहिए?

नीलम के लिए पाँच वर्ष की अवधि दी गई है। इसकी गणना धारण करने के दिन से होती है। पाँच वर्ष पूरे होने के बाद दूसरा नीलम लेने का निर्देश है।

नीलम की अवधि को हीरे की सात वर्ष या पन्ना की तीन वर्ष वाली अवधि से नहीं मिलाना चाहिए। हर रत्न के लिए अलग निर्देश है। इसी कारण सभी अंगूठियों को एक ही तारीख पर बदलने का सामान्य नियम नहीं बनाया जा सकता।

नीलम की पहचान और धारण विधान में उसके चयन और पहनने की प्रक्रिया अलग समझी जा सकती है। अवधि की गणना के लिए पहली बार धारण करने की तारीख सुरक्षित रखें।

गोमेद और लहसुनिया कब बदलें?

गोमेद और लहसुनिया दोनों के लिए इस अवधि-विधान में तीन वर्ष दिए गए हैं। दोनों का ग्रह-संबंध अलग है—गोमेद राहु का और लहसुनिया केतु का रत्न है। समान अवधि होने से उनकी पूजा या धारण-विधि एक नहीं हो जाती।

गोमेद की अवधि

गोमेद का प्रभाव तीन वर्ष तक बताया गया है। उसके बाद दूसरा गोमेद धारण करने का निर्देश है। नए रत्न के चयन में शहद जैसी आभा, स्वच्छता और बनावट जैसे गुणों को अलग देखना चाहिए। गोमेद की पहचान और धारण विधि इन विषयों को विस्तार देती है।

लहसुनिया की अवधि

लहसुनिया के लिए पहनने के दिन से तीन वर्ष की अवधि दी गई है। इसके बाद दूसरा लहसुनिया धारण करने का निर्देश इस अवधि-विवरण में है।

लहसुनिया की एक अलग संक्षिप्त धारण-विधि में तीन वर्ष बाद नई अंगूठी में रत्न जड़वाकर पुनः अभिमंत्रित करने का निर्देश भी आता है। नया रत्न लेना और उसी रत्न को नई अंगूठी में जड़वाना अलग प्रक्रियाएँ हैं। इसलिए इन दोनों निर्देशों को एक जैसा लिखने के बजाय अपनाए गए विधान के अनुसार स्पष्ट रखना चाहिए। लहसुनिया की धारण-विधियों में यह अंतर विस्तार से समझाया गया है।

क्या अंगूठी बदलने से रत्न की अवधि फिर शुरू हो जाती है?

अंगूठी की मरम्मत, धातु बदलना, रत्न दोबारा जड़वाना और नया रत्न धारण करना अलग-अलग काम हैं। केवल नई अंगूठी बनवाने से हर पुराने रत्न की अवधि अपने-आप फिर शुरू हो जाती है—ऐसा सामान्य नियम यहाँ नहीं दिया गया है।

जहाँ पुनः जड़ाई और अभिमंत्रण का स्पष्ट विधान है, उसे उसी रत्न और उसी प्रक्रिया के संदर्भ में समझना चाहिए। लहसुनिया का ऐसा निर्देश सभी नौ रत्नों पर लागू करना उचित नहीं होगा।

इसी तरह सफाई कराने की तारीख को नई धारण-तारीख नहीं बनाया जाना चाहिए। सफाई से आभूषण की स्थिति सुधर सकती है, लेकिन अवधि की मूल गणना का आधार अलग है।

धारण की तारीख और रत्न का विवरण कैसे रखें?

कुछ वर्ष बाद सही तारीख याद रखना कठिन हो सकता है। इसलिए धारण के समय ही छोटा-सा रिकॉर्ड रखना उपयोगी है। इसमें बहुत जटिल जानकारी की आवश्यकता नहीं है।

  • रत्न का नाम: कौन-सा रत्न धारण किया गया है।
  • जड़ाई की तारीख: अंगूठी में रत्न कब जड़ा गया।
  • धारण की तारीख: पहली बार विधिपूर्वक कब पहना गया।
  • रत्न का विवरण: वजन, पहचान और उपलब्ध बिल या परीक्षण-रिपोर्ट।
  • अपनाया गया विधान: विशेष रूप से वहाँ, जहाँ अलग धारण-विधियाँ हैं।
  • बाद का परिवर्तन: मरम्मत, पुनः जड़ाई या नया रत्न लेने का विवरण।

यह रिकॉर्ड होने पर अंगूठी की मरम्मत और रत्न बदलने की घटना आपस में नहीं मिलती। मोती जैसे रत्न के लिए उसकी वर्तमान आभा और टूट-फूट का निरीक्षण भी साथ रखें।

पुराना रत्न उतारने के बाद क्या करें?

रत्न बदलने की अवधि जानना और पुराने रत्न के साथ आगे क्या करना है, ये अलग प्रश्न हैं। यहाँ दिए अवधि-विवरण में सभी रत्नों के लिए कोई एक समान दान, विसर्जन या नष्ट करने की प्रक्रिया नहीं है। इसलिए केवल अवधि पूरी होने के आधार पर ऐसा अतिरिक्त नियम नहीं जोड़ा गया है।

पुराने रत्न को अलग पहचान के साथ सुरक्षित रखें, ताकि वह नए रत्न से न मिले। यदि उसके लिए किसी विशेष धार्मिक प्रक्रिया का पालन किया जा रहा है, तो उसका निर्णय उसी विधान के अनुसार करें।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रत्येक रत्न की अवधि अलग पढ़ें, गणना की सही तारीख रखें और मोती के लिए आभा तथा टूट-फूट वाला विशेष नियम याद रखें। इससे “सभी रत्न तीन साल में बदलें” या “कोई रत्न कभी न बदलें” जैसे अधूरे निष्कर्षों से बचा जा सकता है।