नवरत्न

पुखराज क्यों पहनते हैं? गुरु के रत्न की विशेषताएँ और पहनने का विधान

प्रकाशन: 28 सितम्बर 2026 अंतिम अपडेट: 30 सितम्बर 2026 8 मिनट

पुखराज बृहस्पति यानी गुरु का रत्न है। पीला रंग, साफ चमक और आकर्षक तराश इसकी मुख्य विशेषताएँ हैं। इसकी रंगत कहीं नींबू जैसी हल्की, कहीं हल्दी जैसी पीली और कहीं केसर जैसी गहरी होती है। सोने की अंगूठी में जड़ने पर पुखराज का रंग और चमक दोनों उभरकर दिखाई देते हैं।

ज्योतिष में गुरु ज्ञान, बुद्धि, धर्म, प्रतिष्ठा और पारिवारिक सुख का कारक है। पुखराज इन्हीं विषयों से जुड़ा रत्न है। इसे गुरु की अनुकूलता, विद्या, यश और समृद्धि के उद्देश्य से धारण किया जाता है।

पुखराज पहनने की विधि में गुरुवार, सोने की अंगूठी, निर्धारित उँगली, गुरु मंत्र, पूजन और दान का अपना स्थान है। धारण करने से पहले उसके रंग, साफपन, तराश और दोषों को समझना भी आवश्यक है।

पुखराज का परिचय

पुखराज का एक नाम पुष्पराग है। फारसी में इसे जर्दयाकूत कहा जाता है। यह नवरत्नों में शामिल है और बृहस्पति का प्रतिनिधित्व करता है।

नवरत्नों के नाम और उनके ग्रहों के संबंध में पुखराज का स्थान गुरु के साथ है। माणिक्य सूर्य का, मोती चंद्रमा का, मूँगा मंगल का और पन्ना बुध का रत्न है। इस प्रकार प्रत्येक रत्न का ज्योतिषीय उपयोग उसके संबंधित ग्रह से निर्धारित होता है।

विषय

विवरण

प्रचलित नाम

पुखराज

अन्य नाम

पुष्पराग, जर्दयाकूत

संबंधित ग्रह

बृहस्पति या गुरु

रत्न समूह

नवरत्न

मुख्य रंग

पीला

धारण का दिन

गुरुवार

प्रमुख धातु

सोना

सामान्य उँगली

तर्जनी

उपरत्न

सुनहला

पुखराज का रंग कैसा होता है?

पुखराज का पीला रंग एक ही प्रकार का नहीं होता। उसकी हल्की और गहरी छटाओं को नींबू, हल्दी, केसर और कमरख के रंग से समझा जा सकता है।

नींबू जैसा हल्का पीला

इस रंग के पुखराज में पीलापन हल्का और सौम्य होता है। साफपन अच्छा होने पर प्रकाश उसके भीतर से गुजरता है और चमक स्पष्ट दिखाई देती है। हल्का रंग होने से रत्न की तराश और भीतर की बनावट भी आसानी से नजर आती है।

हल्दी जैसा पीला

हल्दी जैसी रंगत में पीलापन अधिक स्पष्ट होता है। ऐसे पुखराज का रंग पहली दृष्टि में ध्यान खींचता है। अच्छी तराश उसके रंग को संतुलित रूप देती है।

केसर जैसी गहरी आभा

गहरे पीले पुखराज में केसर जैसी आभा दिखाई दे सकती है। अंगूठी में जड़े ऐसे रत्न का रंग सोने के साथ अच्छी तरह उभरता है। गहरे रंग के साथ साफपन और चमक भी उसके रूप का महत्वपूर्ण भाग हैं।

रंग देखते समय पूरे रत्न को अलग-अलग दिशाओं से देखना चाहिए। इससे उसकी रंगत, पारदर्शिता और भीतर की असमानता समझ में आती है।

अच्छे पुखराज की चार विशेषताएँ

अच्छे पुखराज के गुणों में चिकनापन, साफपन, चमक और अच्छी तराश प्रमुख हैं। इन्हीं के मेल से उसका आकर्षण बनता है।

1. साफ और पानीदार चमक

“पानीदार” रत्न वह है जिसकी चमक साफ और जीवंत दिखाई दे। पुखराज में अधिक धुँधलापन होने पर उसकी पीली आभा दब जाती है। साफ रत्न में रंग और प्रकाश का प्रभाव अधिक स्पष्ट होता है।

2. चिकनी सतह

तराशे हुए पुखराज की सतह चिकनी और सुगठित होनी चाहिए। उसके फलकों और किनारों में संतुलन होने से आकार सुंदर दिखाई देता है। सतह की टूट-फूट या किनारों का नुकसान उसके रूप को प्रभावित करता है।

3. अच्छी तराश

रत्न की कटाई को “घाट” भी कहा जाता है। अच्छी घाट में रत्न का आकार, गहराई और फलकों का मेल ठीक होता है। इससे रंग और चमक दोनों अच्छी तरह सामने आते हैं।

4. आकर्षक रंग

पुखराज में पीले रंग की स्पष्टता और उसका संतुलन महत्वपूर्ण है। केवल गहरा पीलापन ही पूरा गुण नहीं है; रंग के साथ साफपन और चमक भी देखी जाती है।

रत्न की बनावट, उत्पत्ति और तराश का अंतर रत्नों के प्रकार और उनके परिचय से और अच्छी तरह समझा जा सकता है।

पुखराज के दोष

पुखराज में दोरंगापन, चीरा, धुँधलापन तथा सफेद या लाल चिह्न उसके गुण-विवेचन का हिस्सा हैं।

दोष

पहचान

दोरंगापन

एक ही रत्न में दो अलग रंग स्पष्ट होना

चीरा

दरार या फटाव जैसा निशान

धुँधलापन

भीतर का भाग साफ न दिखाई देना

सफेद छींट

सफेद बिंदु, धब्बे या अलग रंग के हिस्से

लाल बिंदु

लालिमा लिए छोटे चिह्न

असमान रंग

अलग-अलग भागों में रंग की स्पष्ट असमानता

रत्न की ऊपरी सतह और भीतर की बनावट, दोनों को देखना चाहिए। कुछ निशान सामान्य प्रकाश में दिखाई देते हैं और कुछ रत्न को घुमाने पर स्पष्ट होते हैं।

ये गुण-दोष देखने के संकेत हैं। प्राकृतिक, निर्मित और उपचारित रत्न की पहचान के लिए उसकी जाँच रिपोर्ट अलग जानकारी देती है।

गुरु से जुड़े जीवन-विषय और पुखराज

ज्योतिषीय फल-विवेचन में पुखराज का संबंध विद्या, विवेक, यश, धन-धान्य, विवाह और धार्मिक रुचि से है।

विद्या और विवेक

गुरु ज्ञान और मार्गदर्शन का कारक है। इसी आधार पर पुखराज अध्ययन, समझ और विवेक के उद्देश्य से धारण किया जाता है। यहाँ विद्या का अर्थ केवल पढ़ाई नहीं, बल्कि सीखी हुई बातों को समझना और उचित दिशा में उपयोग करना भी है।

पन्ना रत्न का संबंध भी बुद्धि और विद्या से है, लेकिन उसका ग्रह बुध है। पन्ने और पुखराज का चयन उनके अलग ग्रह-संबंध के अनुसार होता है।

यश और समृद्धि

पुखराज के ज्योतिषीय फल में प्रतिष्ठा, धन-धान्य और समृद्धि शामिल हैं। गुरु की अनुकूलता के उद्देश्य से इसे धारण किया जाता है। धन-धान्य में आय के साथ गृहस्थ जीवन की संपन्नता का भाव भी जुड़ा है।

विवाह और पारिवारिक सुख

पुखराज वैवाहिक सुख और संतान-सुख से संबंधित रत्न है। विवाह में बाधा के प्रसंग में गुरु की स्थिति के साथ इसका विचार किया जाता है।

व्यक्तिगत चयन में लग्न, गुरु का स्थान और कुंडली में उसकी भूमिका देखी जाती है। इसलिए पुखराज का सामान्य परिचय और किसी व्यक्ति के लिए उसका चयन अलग विषय हैं।

धर्म और आध्यात्मिक चिंतन

धार्मिक कार्य, सद्विचार और आध्यात्मिक रुचि गुरु के विषय हैं। पुखराज के धारण-विधान में मंत्र, पूजन और दान इसी ग्रह-संबंध के अनुसार रखे गए हैं।

पुखराज और सुनहले में अंतर

सुनहला पुखराज का उपरत्न है। इसका रंग हल्का पीला, सरसों जैसा पीला या अधिक गहरा हो सकता है। पुखराज के विकल्प के रूप में सुनहला धारण किया जाता है।

दोनों का रंग मिलता-जुलता हो सकता है, लेकिन उपरत्न होना और वही खनिज होना अलग बातें हैं। आधुनिक रत्न-विज्ञान में Yellow Sapphire, Topaz और Citrine अलग रत्न हैं। Citrine क्वार्ट्ज का पीला से नारंगी प्रकार है।

खरीदते समय नाम स्पष्ट रखें। केवल “पीला रत्न” कहना पर्याप्त नहीं है। पुखराज, सुनहला और टोपाज़ की वास्तविक पहचान जाँच रिपोर्ट में देखी जा सकती है।

पुखराज किस दिन पहनते हैं?

पुखराज धारण करने का मुख्य दिन गुरुवार है। शुक्ल पक्ष, गुरु की होरा और गुरु-पुष्य योग इसके मुहूर्त-विचार में आते हैं।

पुनर्वसु, विशाखा और पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र भी धारण के लिए दिए गए हैं। विस्तृत अनुष्ठान में पुष्य नक्षत्र के गुरुवार को प्रातःकाल का समय रखा गया है।

धारण का क्रम है:

  1. गुरुवार और शुभ मुहूर्त का चयन।
  2. अंगूठी तथा पूजन-सामग्री की तैयारी।
  3. गुरु-पूजन और मंत्र-जप।
  4. अभिमंत्रित अंगूठी धारण।
  5. गुरु से संबंधित वस्तुओं का दान।

धातु, उँगली और वजन

सोने की अंगूठी

पुखराज के लिए सोने की अंगूठी प्रमुख है। रत्न ठीक प्रकार से जड़ा होना चाहिए और अंगूठी उँगली के अनुकूल होनी चाहिए।

दाएँ हाथ की तर्जनी

सामान्य धारण-विधि में दाएँ हाथ की तर्जनी दी गई है। यह अँगूठे के पास वाली उँगली है। विस्तृत पूजन-विधान में तर्जनी के साथ अनामिका का विकल्प भी है।

रत्ती में वजन

विस्तृत विधान में चार रत्ती से अधिक पुखराज और पाँच, सात, आठ, दस, बारह तथा चौदह रत्ती के वजन दिए गए हैं। संक्षिप्त और विस्तृत विधि की वजन-सूचियाँ अलग हैं; चयन में जिस विधान का पालन हो, उसी का क्रम रखा जाता है।

रत्न का वजन और सोने की अंगूठी का वजन अलग-अलग हैं। अंगूठी बनवाते समय दोनों स्पष्ट लिखवाने चाहिए।

पुखराज धारण की पूजा-विधि

पूजन में गुरु यंत्र, कलश, पीले पुष्प, चने की दाल, मंत्र-जप और दान का क्रम आता है।

पूजन-स्थान तैयार करें

स्वच्छ स्थान पर अंगूठी और पूजन-सामग्री रखें। पीले पुष्प, जल तथा गुरु-पूजन की आवश्यक वस्तुएँ साथ रखें।

गुरु यंत्र और कलश स्थापित करें

विस्तृत विधान में गुरु यंत्र रखा जाता है। चने की दाल से मंडल बनाकर जल से भरे कलश की स्थापना की जाती है। इसके बाद गुरु का पूजन होता है।

मंत्र से अभिमंत्रित करें

पूजन के बाद गुरु मंत्र से अंगूठी अभिमंत्रित की जाती है।

ॐ ऐं श्रीं बृहस्पतये नमः।

विस्तृत कर्मकांड में मंत्र-जप और हवन भी शामिल हैं। संक्षिप्त पूजन और विस्तृत अनुष्ठान का क्रम अलग रखा जाता है।

अंगूठी धारण करें

पूजन के बाद शुभ मुहूर्त में अंगूठी पहनें। सामान्य विधि में दाएँ हाथ की तर्जनी और विस्तृत विधान में तर्जनी अथवा अनामिका का निर्देश है।

दान दें

गुरु से संबंधित दान-सामग्री में ये वस्तुएँ शामिल हैं:

  • हल्दी।
  • चने की दाल।
  • पीले पुष्प।
  • पीला वस्त्र।
  • शक्कर।
  • यथाशक्ति दक्षिणा।

विस्तृत अनुष्ठान में गुरु यंत्र का दान भी है। अलग-अलग रत्नों के दिन, धातु और पूजन-क्रम रत्न धारण विधि में साथ समझे जा सकते हैं।

पारंपरिक चिकित्सा में पुखराज

पुरानी रत्न-चिकित्सा पद्धति में पुखराज के औषधीय प्रयोग पीलिया, पाण्डु, प्लीहा-संबंधी विकार, खाँसी, दंत रोग, मुख की दुर्गंध, बवासीर और मंदाग्नि जैसे रोग-संदर्भों में वर्णित हैं।

ये वैद्य की देखरेख में तैयार औषधियों के संदर्भ हैं। पुखराज की अंगूठी पहनना इन औषधीय प्रयोगों के समान नहीं है।

सूचना: ज्योतिषीय फल पारंपरिक मान्यताओं के संदर्भ में हैं। औषधीय प्रयोग योग्य चिकित्सक की देखरेख में करें।