ज्योतिष

ज्योतिष सीखना कहाँ से शुरू करें? ग्रह, राशि और भाव की पहली समझ

प्रकाशन: 29 सितम्बर 2026 अंतिम अपडेट: 1 अक्टूबर 2026 12 मिनट

ज्योतिष सीखने की शुरुआत ग्रह, राशि और भाव को समझने से होती है। जन्मकुंडली में कौन-सा ग्रह है, वह किस राशि में बैठा है और किस भाव में स्थित है—ये तीन बातें पहचानना पहला अभ्यास है। इन्हीं के आधार पर आगे लग्न, भावेश, दृष्टि, युति और दशा का अध्ययन किया जाता है।

शुरू में कुंडली के खाने, उनमें लिखे अंक और ग्रहों के छोटे नाम उलझे हुए लग सकते हैं। लेकिन जैसे ही यह स्पष्ट हो जाता है कि अंक क्या बता रहे हैं और ग्रह कहाँ स्थित हैं, कुंडली का चित्र पढ़ना आसान होने लगता है। इस पाठ में हम इन्हीं मूल बातों को एक-एक करके समझेंगे।

पहले पाठ का उद्देश्य है कि आप किसी सरल उदाहरण में ग्रह का नाम, उसकी राशि और उसका भाव अलग-अलग पहचान सकें। फल-विचार का आधार यही स्पष्ट पहचान है।

ज्योतिष में जन्मकुंडली से क्या समझते हैं?

जन्मकुंडली जन्म के समय और स्थान के अनुसार बनाई गई ग्रह-स्थिति की रूपरेखा है। इसमें राशियों, ग्रहों और भावों को एक निश्चित व्यवस्था में दिखाया जाता है। कुंडली पढ़ते समय ज्योतिषी इसी व्यवस्था के आधार पर ग्रहों के संबंध और जीवन के विभिन्न विषयों का विचार करता है।

जन्म की तारीख, समय और स्थान से उस क्षण का लग्न तथा ग्रहों की स्थिति निर्धारित की जाती है। इसके बाद देखा जाता है कि कौन-सी राशि किस भाव में है और कौन-सा ग्रह कहाँ स्थित है।

उदाहरण के लिए, “सूर्य सिंह राशि में है” ग्रह और राशि का संबंध बताता है। “सूर्य पंचम भाव में है” ग्रह और भाव का संबंध बताता है। दोनों वाक्य एक ही ग्रह के बारे में अलग जानकारी देते हैं। पूरी स्थिति समझने के लिए दोनों को साथ पढ़ा जाता है।

ग्रह, राशि और भाव में क्या अंतर है?

ज्योतिष के पहले पाठ की सबसे महत्वपूर्ण बात यही है। ग्रह, राशि और भाव आपस में जुड़े हैं, लेकिन तीनों का काम अलग है।

आधार

क्या समझाता है?

सरल उदाहरण

ग्रह

कारकत्व और ग्रह का स्वभाव

चंद्रमा का संबंध मन से है

राशि

ग्रह जिस राशिक्षेत्र में स्थित है, उसका स्वभाव और स्वामी

चंद्रमा वृषभ राशि में है

भाव

जीवन का वह क्षेत्र जिसका विचार किया जा रहा है

चंद्रमा द्वितीय भाव में है

इसे एक वाक्य में जोड़ें: “चंद्रमा वृषभ राशि में द्वितीय भाव में स्थित है।” इसमें चंद्रमा ग्रह है, वृषभ राशि है और द्वितीय भाव उसकी भाव-स्थिति है।

इस वाक्य को पढ़ने के बाद आगे तीन प्रश्न उठते हैं: चंद्रमा किन विषयों का कारक है, वृषभ राशि का स्वभाव कैसा है और द्वितीय भाव किन विषयों को बताता है? ज्योतिष का अध्ययन इन्हीं प्रश्नों को क्रम से खोलता है।

ज्योतिष के नौ ग्रह और उनके मुख्य कारकत्व

ज्योतिष में सूर्य, चंद्रमा, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु—इन नौ ग्रहों का विचार किया जाता है। राहु और केतु छाया ग्रह कहलाते हैं। जन्मकुंडली में इनकी स्थिति भी अन्य ग्रहों के साथ पढ़ी जाती है।

कारकत्व का अर्थ है किसी ग्रह का विशेष विषयों का प्रतिनिधित्व करना। जैसे सूर्य आत्मा और अधिकार का, चंद्रमा मन का तथा बुध बुद्धि और वाणी का कारक है। एक ग्रह के अनेक कारकत्व होते हैं; शुरुआत के लिए नीचे मुख्य विषय दिए गए हैं।

ग्रह

शुरुआत में याद रखने योग्य मुख्य विषय

सूर्य

आत्मा, पिता, अधिकार और प्रतिष्ठा

चंद्रमा

मन, माता, भावनाएँ और मानसिक सुख

मंगल

पराक्रम, बल, भूमि और साहस

बुध

बुद्धि, वाणी, गणना और व्यापार

बृहस्पति या गुरु

ज्ञान, धर्म, गुरु और संतान

शुक्र

दांपत्य, कला, सौंदर्य और भोग-सुख

शनि

श्रम, सेवा, आयु और कठिनाइयों का सामना

राहु

तीव्र अभिलाषा, माया और असामान्य अनुभव

केतु

वैराग्य, मोक्ष और आध्यात्मिक साधना

पहले चरण में हर ग्रह के दो या तीन मुख्य विषय याद करें। इससे आगे किसी ग्रह का नाम आते ही उसके मूल कारकत्व का ध्यान रहेगा। विस्तृत अध्ययन में इन्हीं कारकत्वों के अनेक रूप समझे जाएँगे।

यदि आपने नवरत्नों और उनके ग्रहों का संबंध पढ़ा है, तो ग्रहों के नाम परिचित होंगे। यहाँ उन्हीं ग्रहों को कुंडली के अध्ययन की दृष्टि से समझ रहे हैं।

बारह राशियाँ कौन-सी हैं और उनका क्रम कैसे याद करें?

राशिचक्र के बारह भाग हैं। प्रत्येक राशि का विस्तार 30 अंश है और पूरा राशिचक्र 360 अंश का होता है। राशियों का क्रम मेष से शुरू होकर मीन पर पूरा होता है।

कुंडली में अक्सर राशियों के पूरे नाम के स्थान पर उनके क्रमांक लिखे होते हैं। इसलिए राशि का नाम, उसका अंक और स्वामी ग्रह साथ याद करना उपयोगी है।

अंक

राशि

स्वामी ग्रह

1

मेष

मंगल

2

वृषभ

शुक्र

3

मिथुन

बुध

4

कर्क

चंद्रमा

5

सिंह

सूर्य

6

कन्या

बुध

7

तुला

शुक्र

8

वृश्चिक

मंगल

9

धनु

बृहस्पति

10

मकर

शनि

11

कुंभ

शनि

12

मीन

बृहस्पति

राशियों के स्वामी याद करने का सरल तरीका

सूर्य सिंह राशि का और चंद्रमा कर्क राशि का स्वामी है। बाकी पाँच ग्रहों में प्रत्येक को दो राशियों का स्वामित्व प्राप्त है:

  • मंगल: मेष और वृश्चिक।
  • बुध: मिथुन और कन्या।
  • बृहस्पति: धनु और मीन।
  • शुक्र: वृषभ और तुला।
  • शनि: मकर और कुंभ।

इस पाठ में राशि-स्वामित्व की यही प्रचलित पराशरी व्यवस्था आधार है। आगे भावेश पहचानने में इसी तालिका का बार-बार उपयोग होगा।

कुंडली में लिखा अंक क्या बताता है?

उत्तर भारतीय शैली की जन्मकुंडली में खाने के भीतर लिखा 1 से 12 तक का अंक सामान्यतः राशि का क्रमांक बताता है। जैसे 4 का अर्थ कर्क, 7 का अर्थ तुला और 10 का अर्थ मकर है। उस खाने का भाव अलग से उसकी स्थिति के अनुसार पहचाना जाता है।

इसलिए किसी खाने में 5 लिखा देखकर सीधे उसे पंचम भाव नहीं कहेंगे। पहले उस खाने का भाव पहचानेंगे, फिर अंक 5 से जानेंगे कि वहाँ सिंह राशि है। कुंडली पढ़ने की शुरुआत में यह अंतर बहुत काम आता है।

कुंडली के बारह भाव क्या बताते हैं?

भाव जीवन के अलग-अलग विषयों के अध्ययन का आधार हैं। शरीर, परिवार, शिक्षा, संतान, विवाह, कर्म और आय जैसे विषय अलग भावों से देखे जाते हैं।

हर भाव के कई अर्थ हैं। पहले पाठ में नीचे दिए मुख्य विषय याद रखें। बाद के पाठों में प्रत्येक भाव का विस्तार और उसके स्वामी ग्रह का विचार करेंगे।

भाव

मुख्य विषय

प्रथम

शरीर, व्यक्तित्व, स्वभाव और स्वयं

द्वितीय

परिवार, वाणी और संचित धन

तृतीय

पराक्रम, प्रयास और छोटे भाई-बहन

चतुर्थ

माता, गृह, भूमि, वाहन और सुख

पंचम

बुद्धि, विद्या, संतान और पूर्व पुण्य

षष्ठ

ऋण, रोग, शत्रु और सेवा

सप्तम

विवाह, जीवनसाथी और साझेदारी

अष्टम

आयु, गूढ़ विषय और आकस्मिक परिवर्तन

नवम

धर्म, भाग्य, गुरु और तीर्थयात्रा

दशम

कर्म, व्यवसाय, पद और सामाजिक प्रतिष्ठा

एकादश

लाभ, आय और इच्छाओं की पूर्ति

द्वादश

व्यय, शयन, एकांत और मोक्ष

ध्यान दें कि ग्रहों के कारकत्व और भावों के विषय में कुछ समानताएँ दिखाई देती हैं। जैसे चंद्रमा माता का कारक है और चतुर्थ भाव से भी माता का विचार होता है। आगे फल-विचार में ग्रह, भाव और भावेश को साथ देखने का आधार यही है।

लग्न क्या है और उससे भाव कैसे गिनते हैं?

जन्म के समय पूर्वी क्षितिज पर उदित राशि लग्न राशि कहलाती है। जन्मकुंडली में प्रथम भाव की पहचान लग्न से होती है। लग्न मिलने के बाद द्वितीय, तृतीय और बाकी भाव क्रम से पहचाने जाते हैं।

यदि जन्म के समय मेष राशि उदित है, तो मेष लग्न होगा। यदि कर्क राशि उदित है, तो कर्क लग्न होगा। इसी प्रकार बारह राशियों में से कोई भी लग्न हो सकती है।

इस शुरुआती अभ्यास में राशि-आधारित लग्न कुंडली पढ़ेंगे, जिसमें लग्न राशि प्रथम भाव, उससे अगली राशि द्वितीय भाव और आगे की राशियाँ क्रमशः अगले भाव में ली जाती हैं। भाव चलित का अध्ययन आगे अलग पाठ में आएगा।

मेष लग्न में राशियों का क्रम

मेष लग्न में प्रथम भाव में मेष, द्वितीय में वृषभ, तृतीय में मिथुन और इसी क्रम से द्वादश में मीन राशि होगी। यहाँ राशि के अंक और भाव की संख्या एक जैसे दिखते हैं।

वृषभ लग्न में वही क्रम कैसे बदलेगा?

वृषभ लग्न में प्रथम भाव में वृषभ, द्वितीय में मिथुन, तृतीय में कर्क और चतुर्थ में सिंह राशि होगी। बारहवीं राशि मीन के बाद फिर मेष आती है। इसलिए वृषभ लग्न का द्वादश भाव मेष राशि का होगा।

यहीं से स्पष्ट होता है कि राशि और भाव अलग हैं। वृषभ राशि का क्रमांक हमेशा 2 है, लेकिन वृषभ लग्न की कुंडली में वह प्रथम भाव में होती है।

अभ्यास उदाहरण: ग्रह, राशि और भाव एक साथ पहचानें

अब सीखने के लिए एक सरल अभ्यास उदाहरण लें। इसमें मेष लग्न मानते हैं और तीन ग्रह-स्थितियाँ पढ़ते हैं:

  • चंद्रमा वृषभ राशि में है।
  • सूर्य सिंह राशि में है।
  • शनि मकर राशि में है।

मेष लग्न में राशियाँ मेष से क्रमवार चलेंगी। इसलिए वृषभ द्वितीय भाव, सिंह पंचम भाव और मकर दशम भाव में आएगी।

ग्रह

राशि

भाव

पूरा वाक्य

चंद्रमा

वृषभ

द्वितीय

चंद्रमा वृषभ राशि में द्वितीय भाव में है।

सूर्य

सिंह

पंचम

सूर्य सिंह राशि में पंचम भाव में है।

शनि

मकर

दशम

शनि मकर राशि में दशम भाव में है।

पहली स्थिति को खोलकर समझें

“चंद्रमा वृषभ राशि में द्वितीय भाव में है”—इसमें चंद्रमा ग्रह है। उसके मुख्य कारकत्व में मन और माता आते हैं। वृषभ राशि का स्वामी शुक्र है। द्वितीय भाव के मुख्य विषय परिवार, वाणी और संचित धन हैं।

इस प्रकार एक ग्रह-स्थिति से अध्ययन की कई बातें सामने आ गईं: ग्रह का कारकत्व, राशि का स्वामी और भाव का विषय। अभी हमारा अभ्यास इनको सही पहचानने का है। आगे इन्हीं संबंधों के आधार पर फल-विचार का क्रम सीखेंगे।

अगर लग्न बदल दें तो क्या होगा?

अब केवल समझने के लिए वृषभ लग्न लें और चंद्रमा को वृषभ राशि में ही रखें। इस बार वृषभ प्रथम भाव में है। इसलिए वाक्य होगा: “चंद्रमा वृषभ राशि में प्रथम भाव में है।”

चंद्रमा की राशि वही रही, लेकिन लग्न बदलने से उसका भाव बदल गया। यही ग्रह की राशि-स्थिति और भाव-स्थिति के बीच का स्पष्ट अंतर है।

जन्मराशि और लग्न में पहला अंतर समझें

जन्मकुंडली में चंद्रमा जिस राशि में स्थित हो, वह चंद्र राशि या जन्मराशि कहलाती है। लग्न जन्म के समय पूर्व में उदित राशि है। इसलिए जन्मराशि और लग्न अलग आधार पर निर्धारित होते हैं।

हमारे अभ्यास उदाहरण में मेष लग्न है और चंद्रमा वृषभ राशि में है। अतः इस उदाहरण का लग्न मेष और जन्मराशि वृषभ होगी।

यदि चंद्रमा लग्न राशि में ही हो, तो लग्न और जन्मराशि एक भी हो सकते हैं। इन्हें पहचानने का तरीका फिर भी वही रहेगा—लग्न के लिए उदित राशि और जन्मराशि के लिए चंद्रमा की राशि देखेंगे।

राशि का स्वामी और उस राशि में बैठा ग्रह अलग कैसे हैं?

जिस ग्रह को किसी राशि का स्वामित्व प्राप्त है, वह उस राशि का स्वामी कहलाता है। राशि में उस समय स्थित ग्रह वहाँ बैठा हुआ ग्रह है। दोनों एक हो सकते हैं और अलग भी हो सकते हैं।

उदाहरण में चंद्रमा वृषभ राशि में है। वृषभ का स्वामी शुक्र है। इसलिए चंद्रमा वहाँ स्थित ग्रह है और शुक्र उस राशि का स्वामी है। चंद्रमा के वहाँ होने से वृषभ का स्वामित्व नहीं बदलता।

इसी उदाहरण में सूर्य सिंह राशि में है। सिंह का स्वामी सूर्य ही है। यहाँ राशि में बैठा ग्रह और राशि का स्वामी एक हैं। इसे स्वराशि में स्थित होना कहते हैं।

आगे जब भावेश पढ़ेंगे, तो यही स्वामित्व काम आएगा। जिस भाव में जो राशि है, उस राशि का स्वामी उस भाव का भावेश कहलाता है। मेष लग्न के द्वितीय भाव में वृषभ राशि होने से शुक्र द्वितीय भाव का स्वामी होगा।

ज्योतिष सीखने का सही अध्ययन क्रम

बुनियाद स्पष्ट होने के बाद आगे की पढ़ाई इस क्रम में करें:

  1. नौ ग्रह और उनके कारकत्व: प्रत्येक ग्रह किन विषयों का प्रतिनिधित्व करता है।
  2. बारह राशियाँ और उनके स्वामी: राशि का क्रमांक और स्वामित्व।
  3. बारह भाव: प्रत्येक भाव से कौन-से विषय देखे जाते हैं।
  4. लग्न और भावों की पहचान: कुंडली के चित्र में सही स्थान पढ़ना।
  5. भावेश और ग्रह-स्थिति: किस भाव का स्वामी कहाँ स्थित है।
  6. दृष्टि और युति: ग्रहों के आपसी संबंध।
  7. ग्रह की अवस्था और बल: स्वराशि, उच्च, नीच, अस्त और वक्री स्थिति।
  8. फल-विचार: भाव, भावेश और कारक को जोड़कर अध्ययन।
  9. दशा और गोचर: समय के अनुसार ग्रहों के फल का विचार।

हर चरण के बाद छोटी कुंडली या उदाहरण पर अभ्यास करें। ग्रहों के नाम याद होने पर उन्हें चित्र में ढूँढ़ें। राशियों का क्रम याद होने पर अंक पढ़ें। भावों के विषय समझने के बाद किसी ग्रह की पूरी स्थिति एक वाक्य में लिखें।

पहला अभ्यास: आपने कितना समझा?

नीचे दिए प्रश्न पहले स्वयं हल करें। उत्तर देखने से पहले ग्रह, राशि और भाव की तालिकाओं की सहायता ले सकते हैं।

  1. मेष राशि का स्वामी कौन है?
  2. राशि का अंक 4 किस राशि को बताता है?
  3. परिवार, वाणी और संचित धन किस भाव के मुख्य विषय हैं?
  4. मेष लग्न में सिंह राशि किस भाव में आएगी?
  5. मेष लग्न हो और चंद्रमा वृषभ में हो, तो जन्मराशि क्या होगी?
  6. वृषभ में स्थित चंद्रमा और वृषभ के स्वामी में क्या अंतर है?
  7. वृषभ लग्न में मिथुन राशि किस भाव में होगी?
अभ्यास के उत्तर और उनका कारण देखें
  1. मंगल। मेष और वृश्चिक, दोनों राशियों का स्वामी मंगल है।
  2. कर्क। राशिचक्र में मेष 1, वृषभ 2, मिथुन 3 और कर्क 4 है।
  3. द्वितीय भाव। इसके मुख्य विषयों में परिवार, वाणी और संचित धन आते हैं।
  4. पंचम भाव। मेष से गिनने पर वृषभ दूसरा, मिथुन तीसरा, कर्क चौथा और सिंह पाँचवाँ है।
  5. वृषभ। जन्मराशि चंद्रमा की राशि से पहचानी जाती है; लग्न यहाँ मेष है।
  6. चंद्रमा वहाँ स्थित ग्रह है और शुक्र राशि का स्वामी है। किसी ग्रह के बैठने से राशि का स्वामित्व नहीं बदलता।
  7. द्वितीय भाव। वृषभ लग्न में वृषभ प्रथम और उसके बाद मिथुन द्वितीय भाव में आता है।

इस पाठ के बाद आपका अगला कदम

अब आप ग्रह, राशि और भाव का अलग अर्थ जानते हैं। आप यह भी पहचान सकते हैं कि जन्मराशि चंद्रमा से मिलती है, लग्न उदित राशि से और भावों की गिनती लग्न से शुरू होती है।

अगला पाठ है: “नौ ग्रह क्या बताते हैं? सूर्य से केतु तक कारकत्व समझें” उसमें सूर्य से केतु तक प्रत्येक ग्रह का परिचय विस्तार से पढ़ेंगे, ताकि कुंडली में किसी ग्रह को देखते ही उसके मुख्य विषय समझ में आएँ।