ज्योतिष

12 राशियों के नाम, क्रम और स्वामी: कुंडली के अंक पढ़ना सीखें

प्रकाशन: 29 सितम्बर 2026 अंतिम अपडेट: 1 अक्टूबर 2026 11 मिनट

कुंडली में राशियों के पूरे नाम की जगह अक्सर अंक लिखे होते हैं। 1 मेष राशि का संकेत है, 4 कर्क का, 7 तुला का और 10 मकर का। इन अंकों को पहचान लेने पर कुंडली पढ़ने का एक महत्वपूर्ण चरण पूरा हो जाता है। इसके बाद किसी राशि का नाम देखकर उसका स्वामी ग्रह पहचानना सीखते हैं।

पिछले पाठ में हमने नौ ग्रहों के मुख्य कारकत्व समझे थे। अब उन्हीं ग्रहों का राशियों से संबंध पढ़ेंगे। किस ग्रह को कौन-सी राशि का स्वामित्व मिला है और उस जानकारी से भावेश कैसे पहचाना जाता है—इस पाठ में इसकी बुनियाद तैयार होगी।

पहले राशियों का क्रम समझें, फिर उनके स्वामी याद करें। इसके बाद चर, स्थिर और द्विस्वभाव तथा अग्नि, पृथ्वी, वायु और जल वर्गों का सरल परिचय लेंगे। अंत में कुंडली के उदाहरण और छोटा अभ्यास दिया गया है।

राशि क्या है और राशिचक्र में बारह राशियाँ कैसे आती हैं?

ज्योतिष में राशिचक्र का विस्तार 360 अंश है। इसे बारह बराबर भागों में विभाजित किया जाता है। प्रत्येक भाग 30 अंश का होता है और एक राशि कहलाता है। पहली राशि मेष और बारहवीं मीन है।

राशियों का क्रम निश्चित रहता है। मेष के बाद वृषभ, वृषभ के बाद मिथुन और इसी प्रकार मीन के बाद फिर मेष आती है। कुंडली का लग्न बदलने पर राशियों का यह क्रम नहीं बदलता; किसी विशेष भाव में आने वाली राशि बदलती है।

इसे घड़ी के अंकों की तरह समझ सकते हैं। बारह के बाद गिनती फिर एक पर आती है। उसी तरह मीन के बाद मेष से अगला चक्र शुरू होता है। आगे भावों में राशियाँ भरते समय यही क्रम काम आएगा।

12 राशियों के नाम, अंक, चिह्न और स्वामी ग्रह

नीचे दी गई तालिका इस पाठ का मुख्य आधार है। इसमें राशि का क्रमांक, नाम, पहचान-चिह्न और स्वामी ग्रह साथ दिए गए हैं। पहले नाम और अंक का अभ्यास करें, फिर स्वामी ग्रह जोड़ें।

क्रमांक

राशि

राशि का चिह्न

स्वामी ग्रह

1

मेष

मेढ़ा

मंगल

2

वृषभ

बैल

शुक्र

3

मिथुन

युगल

बुध

4

कर्क

केकड़ा

चंद्रमा

5

सिंह

सिंह

सूर्य

6

कन्या

कन्या

बुध

7

तुला

तराजू

शुक्र

8

वृश्चिक

बिच्छू

मंगल

9

धनु

धनुर्धर

बृहस्पति

10

मकर

मकर

शनि

11

कुंभ

कलशधारी

शनि

12

मीन

दो मछलियाँ

बृहस्पति

राशि का चिह्न उसकी पहचान में सहायता करता है। कुंडली पढ़ते समय सबसे अधिक काम उसका क्रमांक और स्वामी ग्रह आएँगे। उदाहरण के लिए, 8 देखकर वृश्चिक और वृश्चिक देखकर मंगल याद आना चाहिए।

राशियों का क्रम आसानी से कैसे याद करें?

बारह नाम एक साथ याद करने के बजाय उन्हें तीन समूहों में बाँटें:

  • पहला समूह: मेष, वृषभ, मिथुन, कर्क।
  • दूसरा समूह: सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक।
  • तीसरा समूह: धनु, मकर, कुंभ, मीन।

पहले हर समूह को बोलकर दोहराएँ। फिर तीनों को जोड़कर मेष से मीन तक पूरा क्रम बोलें। इसके बाद किसी बीच की राशि से शुरू करके क्रम पूरा करें।

उदाहरण के लिए, तुला से शुरू करें: तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुंभ, मीन, मेष, वृषभ, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या। इस अभ्यास से केवल सूची याद नहीं होगी, बल्कि किसी भी लग्न से आगे की राशियाँ गिनना आ जाएगा।

चार प्रमुख अंक पहले याद करें

शुरुआत में 1, 4, 7 और 10 को आधार बना सकते हैं:

  • 1 — मेष
  • 4 — कर्क
  • 7 — तुला
  • 10 — मकर

अब इनके बीच की राशियाँ जोड़ें। मेष और कर्क के बीच वृषभ तथा मिथुन हैं। कर्क और तुला के बीच सिंह तथा कन्या हैं। तुला और मकर के बीच वृश्चिक तथा धनु हैं। मकर के बाद कुंभ और मीन आती हैं।

राशि का स्वामी ग्रह क्या होता है?

ज्योतिष में प्रत्येक राशि का एक स्वामी ग्रह निर्धारित है। जैसे मेष का स्वामी मंगल, वृषभ का शुक्र और मिथुन का बुध है। किसी राशि में दूसरा ग्रह बैठ जाने से उसका स्वामी नहीं बदलता।

मान लें कि चंद्रमा तुला राशि में है। यहाँ चंद्रमा उस राशि में स्थित ग्रह है, जबकि तुला का स्वामी शुक्र है। दोनों अलग बातें हैं। कुंडली पढ़ते समय स्थित ग्रह और राशि के स्वामी को अलग पहचानना आवश्यक है।

इसी प्रकार सूर्य मेष राशि में हो तो मेष का स्वामी मंगल ही रहेगा। सूर्य वहाँ स्थित ग्रह होगा। आगे जब राशि-स्वामी और उसमें बैठे ग्रह का संबंध पढ़ेंगे, तो यह अंतर काम आएगा।

सूर्य और चंद्रमा की एक-एक राशि

इस पाठ में अपनाई गई प्रचलित पराशरी स्वामित्व-व्यवस्था में सूर्य सिंह राशि का और चंद्रमा कर्क राशि का स्वामी है। इन दोनों को पहले याद करें:

  • कर्क — चंद्रमा
  • सिंह — सूर्य

बाकी पाँच ग्रहों की दो-दो राशियाँ

स्वामी ग्रह

पहली राशि

दूसरी राशि

मंगल

मेष

वृश्चिक

बुध

मिथुन

कन्या

बृहस्पति

धनु

मीन

शुक्र

वृषभ

तुला

शनि

मकर

कुंभ

राहु और केतु को इस मूल स्वामित्व-तालिका में अलग राशियाँ नहीं दी गई हैं। शुरुआती भावेश-अभ्यास के लिए ऊपर की सात ग्रहों वाली व्यवस्था का उपयोग करेंगे।

कुंडली का अंक राशि बताता है या भाव?

उत्तर भारतीय शैली की राशि-कुंडली में खाने के भीतर लिखा अंक राशि का क्रमांक बताता है। भाव की पहचान उस खाने के स्थान से की जाती है। इसलिए एक ही अंक अलग लग्न की कुंडलियों में अलग भाव में दिखाई दे सकता है।

उदाहरण: किसी कुंडली के प्रथम भाव में 4 लिखा है। इसका अर्थ है कि लग्न में कर्क राशि है। यह चौथा भाव नहीं है। भाव प्रथम है और राशि चौथी अर्थात कर्क है।

इसी तरह प्रथम भाव में 10 लिखा हो तो मकर लग्न होगा। वहाँ भाव प्रथम और राशि मकर है। अंक 10 से राशि पहचानी गई, भाव की संख्या नहीं।

ग्रह, राशि और भाव की पहली समझ में यही बुनियादी अंतर पढ़ा था। अब राशियों के अंक याद होने पर इसे कुंडली में लागू कर सकते हैं।

कर्क लग्न का उदाहरण: बारह भावों में राशियाँ कैसे रखें?

इस अभ्यास में राशि-आधारित लग्न कुंडली लेते हैं। कर्क लग्न होने पर प्रथम भाव में कर्क राशि होगी। इसके बाद राशियाँ अपने निश्चित क्रम में आएँगी।

भाव

राशि का अंक

राशि

राशि का स्वामी

प्रथम

4

कर्क

चंद्रमा

द्वितीय

5

सिंह

सूर्य

तृतीय

6

कन्या

बुध

चतुर्थ

7

तुला

शुक्र

पंचम

8

वृश्चिक

मंगल

षष्ठ

9

धनु

बृहस्पति

सप्तम

10

मकर

शनि

अष्टम

11

कुंभ

शनि

नवम

12

मीन

बृहस्पति

दशम

1

मेष

मंगल

एकादश

2

वृषभ

शुक्र

द्वादश

3

मिथुन

बुध

इस उदाहरण में मीन राशि नवम भाव में है। मीन के बाद मेष आती है, इसलिए दशम भाव में मेष होगी। राशि का क्रम 12 से फिर 1 पर आ गया, लेकिन भावों की गिनती नवम से दशम की ओर चलती रही।

एक ग्रह जोड़कर पढ़ें

मान लें कि इस कर्क लग्न के अभ्यास उदाहरण में बुध कन्या राशि में है। ऊपर की तालिका से कन्या तृतीय भाव में मिली। अब पूरा वाक्य बनेगा:

“बुध कन्या राशि में तृतीय भाव में स्थित है।”

कन्या का स्वामी भी बुध है। इसलिए इस उदाहरण में बुध अपनी राशि में है। एक ही स्थिति से हमने ग्रह, राशि, भाव और राशि-स्वामी चारों बातें पहचान लीं।

राशि का स्वामी जानकर भावेश कैसे पहचानें?

जिस भाव में जो राशि है, उस राशि का स्वामी उस भाव का स्वामी या भावेश कहलाता है। पहले भाव का स्वामी लग्नेश, दूसरे का द्वितीयेश और इसी प्रकार बाकी भावों के स्वामी पहचाने जाते हैं।

कर्क लग्न के उदाहरण में:

  • प्रथम भाव में कर्क है। कर्क का स्वामी चंद्रमा है, इसलिए चंद्रमा लग्नेश है।
  • चतुर्थ भाव में तुला है। तुला का स्वामी शुक्र है, इसलिए शुक्र चतुर्थेश है।
  • पंचम भाव में वृश्चिक है। वृश्चिक का स्वामी मंगल है, इसलिए मंगल पंचमेश है।
  • दशम भाव में मेष है। मेष का स्वामी भी मंगल है, इसलिए मंगल दशमेश भी है।

इस प्रकार एक ग्रह दो भावों का स्वामी हो सकता है। कर्क लग्न में मंगल पंचम और दशम दोनों भावों का स्वामी हुआ। यह बात राशियों का क्रम और उनका स्वामित्व जानने से निकली है।

चर, स्थिर और द्विस्वभाव राशियाँ क्या हैं?

राशियों को स्वभाव के आधार पर तीन वर्गों में रखा जाता है: चर, स्थिर और द्विस्वभाव। प्रत्येक वर्ग में चार राशियाँ हैं। यह वर्गीकरण राशि के स्वभाव का अध्ययन करने में काम आता है।

वर्ग

राशियाँ

प्रारंभिक अर्थ

चर

मेष, कर्क, तुला, मकर

गति, परिवर्तन और आरंभ का पक्ष

स्थिर

वृषभ, सिंह, वृश्चिक, कुंभ

स्थिरता, धारण और निरंतरता का पक्ष

द्विस्वभाव

मिथुन, कन्या, धनु, मीन

चर और स्थिर दोनों स्वभावों का समावेश

इनका क्रम याद करने का आसान तरीका है: चर, स्थिर, द्विस्वभाव—फिर यही क्रम दोहरता है। मेष चर, वृषभ स्थिर और मिथुन द्विस्वभाव है। फिर कर्क चर, सिंह स्थिर और कन्या द्विस्वभाव है।

इस अभ्यास को तुला से भी दोहराएँ। तुला चर, वृश्चिक स्थिर और धनु द्विस्वभाव होगी। अंत में मकर चर, कुंभ स्थिर और मीन द्विस्वभाव आती है।

अग्नि, पृथ्वी, वायु और जल राशियाँ

तत्व के आधार पर राशियों के चार वर्ग हैं। हर वर्ग में तीन राशियाँ हैं। इससे राशि के स्वभाव का एक और पक्ष समझ में आता है।

तत्व

राशियाँ

स्वभाव समझने के प्रारंभिक संकेत

अग्नि

मेष, सिंह, धनु

तेज, उत्साह और सक्रियता

पृथ्वी

वृषभ, कन्या, मकर

स्थूलता, व्यवहार और आधार

वायु

मिथुन, तुला, कुंभ

गति, विचार और आदान-प्रदान

जल

कर्क, वृश्चिक, मीन

संवेदनशीलता, ग्रहणशीलता और भाव

यहाँ क्रम है: अग्नि, पृथ्वी, वायु, जल। मेष से शुरू करके यही चार तत्व तीन बार दोहरते हैं। इससे हर राशि का तत्व अलग से रटने की आवश्यकता कम होती है।

एक राशि को चार तरह से पहचानें

अब कन्या राशि का पूरा शुरुआती परिचय बनाएँ:

  • क्रमांक: 6।
  • स्वामी: बुध।
  • स्वभाव: द्विस्वभाव।
  • तत्व: पृथ्वी।

इसी तरह कर्क का क्रमांक 4, स्वामी चंद्रमा, स्वभाव चर और तत्व जल है। इस विधि से हर राशि की एक छोटी अध्ययन-पर्ची तैयार की जा सकती है।

लग्न राशि, चंद्र राशि और सूर्य राशि का अंतर

राशियों के नाम सीखने के बाद अगला प्रश्न होता है कि किसी व्यक्ति की कौन-सी राशि देखी जा रही है। लग्न राशि, चंद्र राशि और सूर्य राशि की पहचान अलग आधार से होती है।

  • लग्न राशि: जन्म के समय पूर्वी क्षितिज पर उदित राशि।
  • चंद्र राशि: जन्म के समय चंद्रमा जिस राशि में स्थित हो। जन्मराशि के रूप में प्रायः इसी का प्रयोग होता है।
  • सूर्य राशि: जन्म के समय सूर्य जिस राशि में स्थित हो।

अभ्यास उदाहरण: किसी उदाहरण में कर्क लग्न, चंद्रमा वृषभ में और सूर्य सिंह में रखें। यहाँ लग्न राशि कर्क, चंद्र राशि वृषभ और सूर्य राशि सिंह होगी। तीनों नाम अलग जानकारी दे रहे हैं।

जब कोई व्यक्ति अपनी “राशि” बताए, तो कुंडली के अध्ययन में यह स्पष्ट होना उपयोगी है कि बात जन्मराशि की है या किसी दूसरे आधार की। इससे ग्रह और भाव की आगे की गणना सही क्रम में होती है।

खुद अभ्यास करें: अंक से राशि और राशि से स्वामी

पहले बिना तालिका देखे उत्तर देने का प्रयास करें। जहाँ नाम याद न आए, राशियों का क्रम बोलकर वहाँ तक पहुँचें।

  1. राशि का अंक 8 किस राशि को बताता है?
  2. कुंभ राशि का स्वामी कौन है?
  3. बुध की दोनों राशियाँ कौन-सी हैं?
  4. मीन राशि के बाद कौन-सी राशि आती है?
  5. प्रथम भाव में 7 लिखा हो तो लग्न कौन-सा होगा?
  6. कर्क लग्न के राशि-आधारित उदाहरण में दशम भाव की राशि कौन-सी है?
  7. उसी उदाहरण में दशमेश कौन होगा?
  8. वृषभ चर, स्थिर या द्विस्वभाव में से कौन-सी राशि है?
  9. धनु किस तत्व की राशि है?
  10. चंद्रमा तुला में हो तो चंद्र राशि क्या होगी और उसका स्वामी कौन है?
अभ्यास के उत्तर और कारण देखें
  1. वृश्चिक। तुला 7, वृश्चिक 8 और धनु 9 है।
  2. शनि। मकर और कुंभ दोनों का स्वामी शनि है।
  3. मिथुन और कन्या।
  4. मेष। बारहवीं राशि मीन के बाद क्रम पहली राशि मेष पर आता है।
  5. तुला लग्न। अंक 7 तुला राशि का है; यहाँ वह प्रथम भाव में है।
  6. मेष। कर्क से क्रमवार गिनने पर दशम भाव में मेष आती है।
  7. मंगल। मेष का स्वामी मंगल होने से इस उदाहरण में वह दशमेश है।
  8. स्थिर राशि।
  9. अग्नि तत्व। मेष, सिंह और धनु अग्नि राशियाँ हैं।
  10. चंद्र राशि तुला और उसका स्वामी शुक्र होगा। चंद्रमा वहाँ स्थित ग्रह है, राशि का स्वामी शुक्र है।

अगला पाठ: जन्मकुंडली के चित्र को समझें

अब आप राशि का अंक देखकर उसका नाम और नाम देखकर स्वामी ग्रह पहचानने का अभ्यास कर सकते हैं। आपने यह भी सीखा कि लग्न बदलने पर भावों में राशियाँ बदलती हैं, लेकिन राशियों का अपना क्रम और स्वामित्व वही रहता है।

अगला पाठ है: “कुंडली क्या है? जन्म की जानकारी से बने इस चित्र को समझें।” उसमें जन्मकुंडली की बनावट, उसमें दिखाई देने वाली जानकारी और उसे पढ़ने की शुरुआत समझेंगे।

पिछला पाठ: नौ ग्रह क्या बताते हैं? सूर्य से केतु तक कारकत्व समझें।